दो बैलों की कथा का सारांश – प्रेमचंद
प्रेमचंद की “दो बैलों की कथा” हीरा और मोती नाम के दो बैलों की दोस्ती, स्वाभिमान और आज़ादी की कहानी है। अपने मालिक झूरी से बिछड़कर वे कई मुसीबतें झेलते हैं, पर हिम्मत और एकता से आख़िर घर लौट आते हैं।
प्रेमचंद की “दो बैलों की कथा” हीरा और मोती नाम के दो बैलों की दोस्ती, स्वाभिमान और आज़ादी की कहानी है। अपने मालिक झूरी से बिछड़कर वे कई मुसीबतें झेलते हैं, पर हिम्मत और एकता से आख़िर घर लौट आते हैं।
प्रेमचंद की कहानी “बड़े भाई साहब” में दिन-रात रटने वाला बड़ा भाई बार-बार फेल होता है और खेल-कूद में मस्त छोटा भाई हर साल पास हो जाता है। फिर भी अंत में बड़ा भाई साबित करता है कि ज़िंदगी का अनुभव किताबों से बड़ा होता है।
एक बच्चे ने देखा कि तितली अपने कोकून से निकलने के लिए संघर्ष कर रही है। मदद के लिए उसने कोकून काट दिया, पर तितली के पंख कमज़ोर रह गए और वह कभी उड़ नहीं पाई। दादाजी ने समझाया कि वही संघर्ष उसके पंखों को ताकत देता।
एक आदमी ने देखा कि विशाल हाथी सिर्फ़ एक पतली रस्सी से बंधे हैं और भागते नहीं। महावत ने बताया कि बचपन में इन्हें इसी रस्सी से बांधा गया था, तब ये छूट नहीं पाए और तब से मान बैठे हैं कि रस्सी तोड़ना नामुमकिन है।
दो मेंढक मक्खन बनाने वाले दूध के बर्तन में गिर गए। एक ने हार मान ली और डूब गया। दूसरा लगातार पैर चलाता रहा — दूध मथकर मक्खन बन गया और उसी पर चढ़कर वह बाहर कूद गया।
सुनहरे रुरु मृग ने नदी में डूबते एक आदमी की जान बचाई और बस इतना वचन मांगा कि वह किसी को उसके बारे में न बताए। इनाम के लालच में उस आदमी ने राजा को मृग का पता बता दिया। पर मृग की करुणा देखकर राजा ने उसे अभय दिया और धोखेबाज़ को धिक्कारा।
मीठे आमों के लालच में राजा के सैनिकों ने बंदरों को घेर लिया। बंदरों के राजा ने अपने शरीर को नदी पार पुल बनाकर पूरे झुंड को बचाया। उसकी त्याग-भावना देखकर काशी के राजा का हृदय बदल गया और उसने सीखा कि सच्चा राजा प्रजा के लिए जीता है।
जंगल के चार दोस्तों — खरगोश, बंदर, सियार और ऊदबिलाव — ने दान करने का संकल्प लिया। भूखे ब्राह्मण के वेश में आए देवराज इंद्र को देने के लिए खरगोश के पास कुछ नहीं था, तो उसने खुद को अर्पित कर दिया। इंद्र ने उसकी याद में चंद्रमा पर खरगोश का चित्र बना दिया।
गरीब किसान हल्कू कंबल के लिए जोड़े तीन रुपये कर्ज़ चुकाने में दे देता है। पूस की कड़ाके की ठंडी रात वह अपने कुत्ते जबरा के साथ खेत की रखवाली करता है, पर ठंड से हारकर सो जाता है और नीलगाएं फसल चर जाती हैं। कहानी किसान की गरीबी और मजबूरी को दिखाती है।
ईमानदार दारोगा वंशीधर ने अमीर पंडित अलोपीदीन की नमक की तस्करी पकड़ी और चालीस हज़ार की रिश्वत भी ठुकरा दी। अदालत में पैसे के ज़ोर से अलोपीदीन छूट गए और वंशीधर की नौकरी चली गई, पर अंत में अलोपीदीन ने ही उनकी ईमानदारी के आगे झुककर उन्हें अपनी जायदाद का मैनेजर बनाया।