बंदरों के राजा का बलिदान – जातक कथा (Monkey King Story)

संक्षेप में: गंगा किनारे एक आम के पेड़ पर बंदरों का बड़ा झुंड रहता था। मीठे आमों के लालच में काशी के राजा के सैनिकों ने रात में पेड़ घेर लिया। बंदरों के राजा ने अपने शरीर को नदी के ऊपर पुल बनाकर पूरे झुंड को पार करा दिया, पर खुद बुरी तरह घायल हो गया। उसका त्याग देखकर काशी के राजा का हृदय बदल गया।

गंगा किनारे आम का पेड़

हिमालय की तलहटी में गंगा नदी के किनारे आम का एक विशाल पेड़ था। उसके आम इतने मीठे और खुशबूदार थे कि दूर-दूर तक उनकी चर्चा थी। उसी पेड़ पर हज़ारों बंदरों का एक झुंड रहता था, जिसका राजा एक समझदार और बलवान बंदर था।

बंदरों के राजा को एक डर था — “अगर कोई आम नदी में गिरकर बहता हुआ इंसानों तक पहुंच गया, तो वे इस पेड़ के लिए हमें परेशान करेंगे।” इसलिए उसने आदेश दिया था कि नदी की ओर झुकी डालियों के सारे आम समय से पहले तोड़ लिए जाएं।

एक आम की गलती

एक बार पत्तों के बीच छिपा एक आम किसी की नज़र में नहीं आया। पककर वह नदी में गिरा और बहता-बहता नीचे काशी पहुंच गया। वहां के राजा ब्रह्मदत्त नदी में स्नान कर रहे थे। उन्होंने वह आम चखा और उसके स्वाद पर मोहित हो गए।

“ऐसे आम का पेड़ कहां है? हमें वह चाहिए!” राजा ने कहा। वे सैनिकों के साथ नाव से नदी के ऊपर की ओर चल पड़े और आखिर उस पेड़ तक पहुंच गए।

रात का घेरा

पेड़ पर बंदरों को देखकर राजा नाराज़ हुए। “ये बंदर हमारे आम खा रहे हैं। सुबह होते ही इन्हें तीर से भगाओ।” सैनिकों ने रात में पेड़ को चारों ओर से घेर लिया।

बंदर डर से कांपने लगे। तब उनके राजा ने कहा, “घबराओ मत। मैं तुम सबको बचाऊंगा।”

शरीर का पुल

बंदरों का राजा एक डाल से छलांग लगाकर नदी के उस पार पहुंचा। वहां से उसने एक लंबी बेल तोड़ी और उसका एक सिरा अपनी कमर से बांधकर दूसरा सिरा उस पार के पेड़ से बांध दिया। फिर वह वापस छलांग लगाकर आम के पेड़ की डाल तक पहुंचना चाहता था, पर बेल थोड़ी छोटी पड़ गई।

उसने हार नहीं मानी। उसने आम के पेड़ की डाल को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया। अब उसका शरीर और बेल मिलकर नदी के ऊपर एक पुल बन गए।

“जल्दी करो, मेरी पीठ पर से होकर उस पार निकल जाओ!” उसने कहा। एक-एक करके हज़ारों बंदर उसकी पीठ पर पैर रखकर नदी पार कर गए। उनके भारी कदमों से राजा का शरीर घायल होता रहा, पर उसने पकड़ नहीं छोड़ी।

काशी के राजा का बदलाव

सुबह होने से पहले सारे बंदर सुरक्षित पार पहुंच गए। थका और घायल बंदरों का राजा अब डाल पकड़े रहने लायक भी नहीं बचा था।

राजा ब्रह्मदत्त यह सब देख रहे थे। उनकी आंखें भर आईं। उन्होंने सैनिकों से घायल बंदर राजा को सावधानी से नीचे उतरवाया और उसकी सेवा करवाई।

ब्रह्मदत्त ने पूछा, “तुमने अपनी जान खतरे में डालकर इन सबको क्यों बचाया?”

बंदरों के राजा ने धीमी आवाज़ में कहा, “राजन, मैं उनका राजा हूं। राजा का धर्म है कि वह अपनी प्रजा की रक्षा करे, चाहे उसे खुद कितना भी कष्ट उठाना पड़े। आप भी अपनी प्रजा के साथ ऐसा ही करना।”

कथा के अनुसार इन शब्दों के बाद बंदरों के राजा ने शांति से अपनी आंखें मूंद लीं। राजा ब्रह्मदत्त ने उसका सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया और जीवनभर उसकी सीख के अनुसार न्याय और दया से राज किया।

📖 कहानी की सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा नेता वही है जो अपने लोगों की भलाई को अपने आराम से ऊपर रखे। ज़िम्मेदारी का मतलब सिर्फ़ आदेश देना नहीं, मुश्किल में सबसे आगे खड़े रहना है।

कहानी के पात्र

पात्रभूमिका
बंदरों का राजा (बोधिसत्व)जिसने अपने शरीर से पुल बनाकर झुंड को बचाया
बंदरों का झुंडजो राजा की पीठ पर से नदी पार कर गया
काशी के राजा ब्रह्मदत्तजिनका हृदय बंदर राजा का त्याग देखकर बदल गया

बच्चों से पूछें

  1. बंदरों के राजा ने नदी की ओर वाले आम पहले क्यों तुड़वाए?
  2. उसने अपने झुंड को कैसे बचाया?
  3. कक्षा का मॉनिटर या टीम का कप्तान “अच्छा नेता” कैसे बन सकता है?

यह कथा बौद्ध जातक कथाओं की “महाकपि जातक” का हमारे अपने शब्दों में पुनर्कथन है। और पढ़ें: खरगोश का त्याग · जातक कथाएं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बंदरों के राजा के बलिदान की कहानी की सीख क्या है?

यह कहानी सिखाती है कि सच्चा नेता वही है जो अपने लोगों की भलाई को अपने आराम और जान से भी ऊपर रखे। बंदरों के राजा ने अपने शरीर को पुल बनाकर पूरे झुंड को बचाया। ज़िम्मेदारी का मतलब मुश्किल में सबसे आगे खड़े रहना है।

बंदरों के राजा ने नदी पर पुल कैसे बनाया?

बंदरों के राजा ने नदी के उस पार जाकर एक लंबी बेल का एक सिरा पेड़ से और दूसरा अपनी कमर से बांधा। बेल छोटी पड़ी तो उसने आम के पेड़ की डाल को अपने हाथों से पकड़ लिया। इस तरह उसका शरीर और बेल मिलकर पुल बन गए।

यह कहानी किस जातक कथा से है?

यह कहानी बौद्ध जातक कथाओं की “महाकपि जातक” से ली गई है। इसमें बोधिसत्व बंदरों के राजा के रूप में जन्म लेकर अपने झुंड के लिए बलिदान देते हैं। यह कथा प्राचीन भारतीय कला में, जैसे सांची और भरहुत के स्तूपों पर भी दिखाई गई है।

काशी के राजा ने इस घटना से क्या सीखा?

काशी के राजा ब्रह्मदत्त ने बंदर राजा के त्याग से सीखा कि राजा का धर्म अपनी प्रजा की रक्षा करना है, चाहे खुद कष्ट उठाना पड़े। कथा के अनुसार इसके बाद उन्होंने जीवनभर न्याय और दया से राज किया।

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