संक्षेप में: छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया (षष्ठी देवी) की आराधना का पर्व है। इसकी सबसे प्रसिद्ध कथा राजा प्रियव्रत की है, जिनका पुत्र जन्म के समय ही मृत पैदा हुआ। दुखी राजा के सामने षष्ठी देवी प्रकट हुईं और बच्चे को जीवन दे दिया। तभी से संतान की रक्षा और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए कार्तिक शुक्ल षष्ठी को छठ पूजा की जाती है।
छठ पूजा क्या है?
छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र का बड़ा पर्व है, जो अब देश-विदेश में जहां भी ये लोग रहते हैं, वहां मनाया जाता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है, इसलिए इसे “छठ” कहते हैं। यह चार दिन का कठिन व्रत है, जिसमें व्रती (ज़्यादातर महिलाएं, पर पुरुष भी) लगभग 36 घंटे निर्जला उपवास रखते हैं और नदी या तालाब में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
छठ पूजा की कथा — राजा प्रियव्रत और षष्ठी देवी (हमारे शब्दों में)
बहुत पुराने समय में प्रियव्रत नाम के एक राजा थे। उनकी रानी का नाम मालिनी था। राजा-रानी के पास सब कुछ था, पर कोई संतान नहीं थी। इस दुख से दोनों बहुत उदास रहते थे।
एक दिन राजा ने महर्षि कश्यप से अपना दुख कहा। महर्षि ने पुत्र-प्राप्ति के लिए एक बड़ा यज्ञ करवाया और यज्ञ की खीर रानी मालिनी को खाने के लिए दी। कुछ समय बाद रानी मां बनीं, पर दुर्भाग्य से बच्चा मृत पैदा हुआ।
राजा का दिल टूट गया। वे अपने मृत पुत्र को लेकर श्मशान पहुंचे और इतने दुखी हो गए कि अपने प्राण त्यागने का विचार करने लगे। उसी समय आकाश से एक दिव्य विमान उतरा, जिसमें एक तेजस्वी देवी बैठी थीं।
देवी ने कहा, “राजन, मैं ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना हूं। मैं सृष्टि की मूल प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुई हूं, इसलिए मुझे षष्ठी कहते हैं। मैं बच्चों की रक्षा करती हूं।” यह कहकर देवी ने बच्चे को छुआ और वह तुरंत जीवित होकर रोने लगा।
राजा खुशी से देवी के चरणों में गिर पड़े। देवी ने कहा, “राजन, तुम मेरी पूजा करो और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करो।” राजा प्रियव्रत ने अपने राज्य में कार्तिक शुक्ल षष्ठी को षष्ठी देवी की पूजा की परंपरा शुरू की। तभी से यह पर्व मनाया जाता है, और षष्ठी देवी को प्यार से छठी मैया कहा जाने लगा। लोक-मान्यता में छठी मैया को सूर्य देव की बहन भी माना जाता है, इसलिए इस दिन दोनों की पूजा साथ होती है।
छठ से जुड़ी अन्य कथाएं
- कर्ण की कथा: महाभारत के वीर कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे। वे रोज़ घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। मान्यता है कि पानी में खड़े होकर अर्घ्य देने की छठ की परंपरा उन्हीं से शुरू हुई।
- द्रौपदी और पांडव: लोक-कथा है कि जब पांडव जुए में अपना राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा, जिसके बाद पांडवों को उनका राज्य वापस मिला।
- सीता जी और श्रीराम: एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर भगवान राम और माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर सूर्य देव की पूजा की थी।
ध्यान दें: छठ से जुड़ी कथाएं अलग-अलग ग्रंथों और लोक-परंपराओं में अलग रूप में मिलती हैं। राजा प्रियव्रत की कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ी मानी जाती है।
📖 कथा की सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची श्रद्धा और धैर्य से सबसे गहरा दुख भी दूर हो सकता है। छठ पर्व प्रकृति — सूर्य, जल और धरती — के प्रति कृतज्ञता, अनुशासन और परिवार के लिए त्याग का संदेश देता है।
छठ पूजा के चार दिन
| दिन | नाम | क्या होता है |
|---|---|---|
| पहला दिन | नहाय-खाय | स्नान के बाद सात्विक भोजन (कद्दू-भात, चने की दाल) किया जाता है |
| दूसरा दिन | खरना | दिन भर उपवास, शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद; इसके बाद निर्जला व्रत शुरू |
| तीसरा दिन | संध्या अर्घ्य | घाट पर डूबते सूर्य को अर्घ्य; ठेकुआ, फल और सूप से पूजा |
| चौथा दिन | उषा अर्घ्य | उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण |
स्रोत: पुराणों और लोक-परंपरा में प्रचलित छठ कथाएं, हमारे अपने शब्दों में। पूजा की विधि और तिथि के लिए अपने परिवार की परंपरा या स्थानीय पंचांग देखें। और पढ़ें: भाई दूज की कथा · दिवाली की कहानी · त्योहारों की कहानियां
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठ पूजा की कथा क्या है?
छठ की प्रसिद्ध कथा राजा प्रियव्रत की है। महर्षि कश्यप के यज्ञ के बाद उनकी रानी मालिनी को मृत पुत्र हुआ। दुखी राजा के सामने ब्रह्मा जी की मानस पुत्री षष्ठी देवी प्रकट हुईं और बच्चे को जीवित कर दिया। तभी से कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उनकी पूजा होती है।
छठी मैया कौन हैं?
छठी मैया को षष्ठी देवी या देवसेना कहा जाता है। मान्यता है कि वे ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं और प्रकृति के छठे अंश से प्रकट हुईं। वे बच्चों की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। लोक-परंपरा में उन्हें सूर्य देव की बहन भी कहा जाता है।
छठ पूजा कब मनाई जाती है?
छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है, जो दिवाली के लगभग छह दिन बाद आती है। यह चार दिन का पर्व है — नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य। चैत्र महीने में भी एक छठ मनाई जाती है, जिसे चैती छठ कहते हैं।
छठ में डूबते सूर्य को अर्घ्य क्यों दिया जाता है?
छठ ही ऐसा पर्व है जिसमें डूबते और उगते, दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। डूबते सूर्य को अर्घ्य देना यह दिखाता है कि जीवन के हर पड़ाव का सम्मान करना चाहिए। मान्यता है कि शाम का अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा और सुबह का उषा को समर्पित है।
छठ पूजा की कथा से क्या सीख मिलती है?
इस कथा से सीख मिलती है कि सच्ची श्रद्धा और धैर्य से गहरे दुख भी दूर हो सकते हैं। छठ पर्व प्रकृति के प्रति आभार, शुद्धता, अनुशासन और परिवार के लिए त्याग का संदेश देता है। यह पर्व अमीर-गरीब सबको एक ही घाट पर साथ लाता है।