संक्षेप में: एक बूढ़ा बगुला मछलियां न पकड़ पाने पर साधु बनने का नाटक करने लगा। उसने तालाब सूखने का डर दिखाया और मछलियों को “नए तालाब” ले जाने के बहाने एक-एक करके खा लिया। चतुर केकड़े ने उसकी चाल पकड़ ली और धोखेबाज़ बगुले को सज़ा दी।
बूढ़ा बगुला
एक बड़े तालाब के किनारे एक बगुला रहता था। जवानी में वह तेज़ी से मछलियां पकड़ लेता था, पर अब वह बूढ़ा हो गया था। मछलियां उसकी चोंच से फिसल जातीं और वह कई-कई दिन भूखा रह जाता।
भूख से परेशान बगुले ने एक चाल सोची।
साधु का नाटक
अगले दिन से बगुला तालाब के किनारे एक टांग पर खड़ा होकर आंखें बंद कर लेता, जैसे ध्यान कर रहा हो। मछलियां उसके पास से गुज़रतीं, पर वह उन्हें छूता तक नहीं।
तालाब के जीव हैरान हुए। एक केकड़े ने पूछा, “बगुला भाई, आज तुम मछलियां क्यों नहीं पकड़ रहे?”
बगुले ने लंबी सांस लेकर कहा, “भाई, मैंने अब हिंसा छोड़ दी है। मैं तो भगवान का भजन करता हूं। पर मुझे तुम सबकी बड़ी चिंता है। मैंने ज्योतिषियों से सुना है कि बारह साल का सूखा पड़ने वाला है। यह तालाब सूख जाएगा और तुम सब मारे जाओगे।”
“नया तालाब”
यह सुनकर मछलियां घबरा गईं। “अब हम क्या करें, बगुला भगत जी?”
बगुले ने दया दिखाते हुए कहा, “पहाड़ के पीछे एक बहुत बड़ी, गहरी झील है। उसका पानी कभी नहीं सूखता। मैं तुम्हें एक-एक करके अपनी चोंच में उठाकर वहां छोड़ आऊंगा।”
मछलियों ने उस पर भरोसा कर लिया। रोज़ बगुला कुछ मछलियों को चोंच में दबाकर उड़ता और पहाड़ के पीछे एक चट्टान पर ले जाकर उन्हें खा जाता। फिर लौटकर कहता, “वे सब नई झील में बहुत खुश हैं।” चट्टान के पास मछलियों की हड्डियों का ढेर लगता गया।
केकड़े की चतुराई
कुछ दिन बाद केकड़े ने कहा, “बगुला भगत जी, आज मुझे भी नई झील ले चलिए।” बगुले ने सोचा, “रोज़ मछली खाकर मन भर गया, आज केकड़े का स्वाद भी चख लूं।”
केकड़ा बगुले की गर्दन पकड़कर उसकी पीठ पर बैठ गया और दोनों उड़ चले। रास्ते में केकड़े को कहीं कोई झील नहीं दिखी। फिर उसने चट्टान के पास मछलियों की हड्डियों का ढेर देखा। वह सब समझ गया।
केकड़े ने तुरंत अपने मज़बूत पंजों से बगुले की गर्दन कसकर दबा दी। बगुला छटपटाया, पर केकड़े ने पकड़ नहीं छोड़ी। धोखेबाज़ बगुला वहीं ढेर हो गया।
केकड़ा किसी तरह धीरे-धीरे चलकर तालाब लौटा और बची हुई मछलियों को पूरी सच्चाई बताई। मछलियों ने केकड़े का धन्यवाद किया और समझ गईं कि बिना जांचे किसी पर भरोसा करना कितना खतरनाक हो सकता है।
📖 कहानी की सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मीठी बातों और दिखावे पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। दूसरों को धोखा देने वाले का अंत बुरा होता है, और मुसीबत में समझदारी व हिम्मत से ही बचाव होता है।
कहानी के पात्र
| पात्र | भूमिका |
|---|---|
| बगुला (“बगुला भगत”) | साधु का नाटक करके मछलियों को धोखा देने वाला |
| केकड़ा | चतुर जीव, जिसने बगुले की चाल पकड़ी |
| मछलियां | भोले जीव, जिन्होंने बिना जांचे भरोसा किया |
बच्चों से पूछें
- बगुले ने मछलियों को किस बात से डराया?
- केकड़े को बगुले के धोखे का पता कैसे चला?
- “बगुला भगत” मुहावरे का क्या मतलब है?
यह कथा पंचतंत्र के पहले तंत्र “मित्रभेद” की प्रसिद्ध कहानी का हमारे अपने शब्दों में पुनर्कथन है। हिंदी मुहावरा “बगुला भगत” — यानी ऊपर से भला, अंदर से कपटी — इसी कथा से जुड़ा है। और पढ़ें: नीला सियार · पंचतंत्र की कहानियां
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बगुला भगत कहानी की सीख क्या है?
यह कहानी सिखाती है कि मीठी बातों और दिखावे पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। बगुले ने साधु बनकर मछलियों को धोखा दिया, पर चतुर केकड़े ने उसकी चाल पकड़ ली। दूसरों को धोखा देने वाले का अंत बुरा होता है।
“बगुला भगत” का मतलब क्या है?
“बगुला भगत” हिंदी का मुहावरा है, जिसका मतलब है ऐसा व्यक्ति जो ऊपर से बहुत भला और धार्मिक दिखे, पर अंदर से कपटी और स्वार्थी हो। यह मुहावरा पंचतंत्र की उसी कथा से जुड़ा है, जिसमें बगुला साधु बनकर मछलियों को खा जाता है।
केकड़े ने बगुले की चाल कैसे पकड़ी?
केकड़ा बगुले की पीठ पर बैठकर “नई झील” देखने चला। रास्ते में उसे कहीं कोई झील नहीं दिखी, बल्कि एक चट्टान के पास मछलियों की हड्डियों का ढेर दिखा। यह देखकर वह समझ गया कि बगुला सबको धोखा देकर खा रहा था।
यह कहानी पंचतंत्र के किस भाग से है?
बगुला और केकड़े की कहानी पंचतंत्र के पहले तंत्र “मित्रभेद” में आती है। इसे एक पात्र दूसरे को यह समझाने के लिए सुनाता है कि ताकत से ज़्यादा बुद्धि काम आती है और चालाक दुश्मन को भी समझदारी से हराया जा सकता है।