संक्षेप में: एक राजा को अपना पालतू बंदर बहुत प्यारा था। उसने बंदर को अपना अंगरक्षक बना दिया और उसे तलवार भी दे दी। एक दोपहर राजा सो रहा था, तभी एक मक्खी बार-बार उसकी छाती पर आकर बैठने लगी। बंदर ने मक्खी को मारने के लिए पूरी ताकत से तलवार चला दी। मक्खी तो उड़ गई, पर वार राजा पर पड़ा। मूर्ख की वफ़ादारी भी नुकसान ही करती है।
मूर्ख बंदर और राजा की कहानी
बहुत समय पहले एक राज्य में एक राजा था। उसके महल में एक बंदर पला हुआ था। बंदर हर समय राजा के आसपास उछलता-कूदता रहता, उसकी नकल करता और राजा को हंसाता। राजा उसे बहुत चाहता था।
धीरे-धीरे राजा का लगाव इतना बढ़ गया कि उसने कहा, “यह बंदर मुझसे सबसे ज़्यादा प्यार करता है। यह कभी मुझे धोखा नहीं देगा। आज से यही मेरा निजी अंगरक्षक होगा।” उसने बंदर को एक चमचमाती तलवार भी दे दी और आदेश दिया कि कोई भी उसके पास न आए।
मंत्रियों ने समझाया, “महाराज, बंदर वफ़ादार तो है, पर उसमें समझ नहीं है। तलवार जैसी ख़तरनाक चीज़ किसी समझदार के हाथ में ही होनी चाहिए।” पर राजा ने किसी की नहीं सुनी।
एक गर्म दोपहर राजा अपने कक्ष में आराम कर रहा था। बंदर तलवार लिए पास ही पहरा दे रहा था और हवा कर रहा था। तभी कहीं से एक मक्खी उड़ती हुई आई और राजा की छाती पर बैठ गई।
बंदर ने हाथ हिलाकर उसे भगाया। मक्खी उड़ी, फिर आकर बैठ गई। बंदर ने फिर भगाया — मक्खी फिर आ गई। ऐसा कई बार हुआ। अब बंदर को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने सोचा, “यह मक्खी मेरे राजा की नींद ख़राब कर रही है! आज मैं इसे सबक सिखाऊंगा।”
इस बार जैसे ही मक्खी राजा की छाती पर बैठी, बंदर ने आव देखा न ताव — पूरी ताकत से तलवार का वार कर दिया!
मक्खी तो फुर्ती से उड़ गई, पर तलवार सीधे सोते हुए राजा पर जा लगी। (पंचतंत्र की मूल कथा में इस वार से राजा की जान चली जाती है।)
शोर सुनकर मंत्री दौड़े आए। उन्होंने दुखी होकर कहा, “हमने पहले ही कहा था — मूर्ख चाहे कितना भी वफ़ादार हो, उसके हाथ में ताकत देना ख़तरनाक है। मूर्ख मित्र से तो बुद्धिमान शत्रु भी अच्छा।”
📖 कहानी की सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सिर्फ़ प्यार या वफ़ादारी देखकर किसी को बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं देनी चाहिए — उसकी समझ भी परखनी चाहिए। मूर्ख मित्र अनजाने में भी बड़ा नुकसान कर सकता है, इसलिए दोस्त और सलाहकार सोच-समझकर चुनें।
छोटे बच्चों के लिए नरम अंत
माता-पिता के लिए सुझाव: 3–6 साल के बच्चों को सुनाते समय आप अंत ऐसे बदल सकते हैं — “तलवार राजा के पलंग पर लगी और पलंग टूट गया। राजा चौंककर उठ गया और समझ गया कि बंदर को तलवार देना उसकी भूल थी।” सीख वही रहती है, बस अंत डरावना नहीं होता।
कहानी के पात्र
| पात्र | स्वभाव |
|---|---|
| राजा | दयालु, पर ज़िद्दी; सलाह न मानने वाला |
| बंदर | वफ़ादार और प्यारा, पर बिना समझ वाला |
| मंत्री | समझदार, जिन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी |
बच्चों से पूछें
- मंत्रियों ने राजा को क्या चेतावनी दी थी?
- बंदर ने मक्खी पर तलवार क्यों चलाई? क्या उसका इरादा बुरा था?
- “मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अच्छा” — इसका क्या मतलब है?
स्रोत: पंचतंत्र (रचयिता: पंडित विष्णु शर्मा, लगभग 2000 साल पुराना ग्रंथ, सार्वजनिक डोमेन)। कहानी हमारे अपने शब्दों में, बच्चों के लिए सरल भाषा में लिखी गई है। और पढ़ें: पंचतंत्र की कहानियां · ब्राह्मणी और नेवला · बंदर और मगरमच्छ · बोलने वाली गुफा
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मूर्ख बंदर और राजा की कहानी क्या है?
एक राजा ने अपने प्यारे पालतू बंदर को अंगरक्षक बनाकर तलवार दे दी। राजा सो रहा था, तभी एक मक्खी बार-बार उसकी छाती पर बैठी। ग़ुस्से में बंदर ने मक्खी पर तलवार चला दी, मक्खी उड़ गई और वार राजा पर पड़ा। यह पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानी है।
मूर्ख बंदर और राजा की कहानी से क्या सीख मिलती है?
इस कहानी से सीख मिलती है कि केवल वफ़ादारी देखकर किसी को बड़ी ज़िम्मेदारी नहीं देनी चाहिए, उसकी समझ भी परखनी चाहिए। मूर्ख मित्र अनजाने में भी भारी नुकसान कर सकता है, इसलिए कहा जाता है कि मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अच्छा।
मूर्ख मित्र से बुद्धिमान शत्रु अच्छा का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है कि समझदार दुश्मन सोच-समझकर काम करता है और उसकी चालों का अनुमान लगाया जा सकता है, पर मूर्ख दोस्त अच्छी नीयत के बावजूद ऐसा काम कर बैठता है जिससे बड़ा नुकसान हो जाए। इसलिए मित्र चुनते समय समझदारी भी देखनी चाहिए।
यह कहानी पंचतंत्र के किस भाग से है?
मूर्ख बंदर और राजा की कहानी पंचतंत्र के पहले तंत्र “मित्रभेद” से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें दोस्ती, भरोसे और सलाहकारों के चुनाव से जुड़ी कहानियां हैं। पंचतंत्र की रचना पंडित विष्णु शर्मा ने राजकुमारों को नीति सिखाने के लिए की थी।
क्या यह कहानी छोटे बच्चों को सुनानी चाहिए?
मूल कहानी का अंत दुखद है, इसलिए यह 7 साल से बड़े बच्चों के लिए बेहतर है। छोटे बच्चों को सुनाते समय अंत बदलकर बताया जा सकता है कि तलवार पलंग पर लगी और राजा को अपनी भूल समझ आ गई। सीख वही रहती है।