संक्षेप में: ब्रज के लोग हर साल अच्छी बारिश के लिए देवराज इंद्र की पूजा करते थे। बालक कृष्ण ने समझाया कि हमारी गायों को चारा, पानी और छाया गोवर्धन पर्वत देता है, इसलिए उसकी पूजा करनी चाहिए। नाराज़ इंद्र ने ब्रज पर सात दिन तक मूसलाधार बारिश की। तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर छाते की तरह उठा लिया और सबको बचा लिया। इंद्र का घमंड टूट गया।
गोवर्धन पूजा क्या है?
गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है। इस दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा और परिक्रमा की जाती है, और भगवान कृष्ण को ढेर सारे पकवानों का भोग लगाया जाता है, जिसे अन्नकूट कहते हैं। मथुरा-वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में यह बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
गोवर्धन पूजा की कथा (हमारे शब्दों में)
द्वापर युग में भगवान कृष्ण अपने बचपन में गोकुल और ब्रज में रहते थे। ब्रज के लोग ग्वाले थे — उनका जीवन गायों, खेतों और जंगल पर टिका था।
एक दिन कृष्ण ने देखा कि पूरा गांव किसी बड़ी तैयारी में लगा है। तरह-तरह के पकवान बन रहे थे। उन्होंने मां यशोदा से पूछा, “मैया, यह सब किसके लिए हो रहा है?” यशोदा ने बताया, “बेटा, हम देवराज इंद्र की पूजा करेंगे। वही बारिश करते हैं, जिससे घास उगती है और हमारी गायों को चारा मिलता है।”
कृष्ण ने सबको इकट्ठा करके कहा, “बारिश करना तो इंद्र का काम है, वे ऐसा करेंगे ही। पर हमारी गायें तो गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं। वही हमें घास, पानी, फल और छाया देता है। हमें उसी की पूजा करनी चाहिए, जिससे हमें सीधे लाभ मिलता है।”
नंद बाबा और ब्रजवासियों को कृष्ण की बात ठीक लगी। उस साल सबने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा की और सारे पकवान पर्वत को भोग लगाए।
यह देखकर इंद्र बहुत क्रोधित हुए। उन्हें लगा कि एक छोटे-से बालक ने उनका अपमान किया है। उन्होंने बादलों को आदेश दिया कि ब्रज पर इतना पानी बरसाओ कि सब कुछ बह जाए। देखते ही देखते काले बादल छा गए, बिजली कड़कने लगी और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। घर डूबने लगे, गायें और लोग डर से कांपने लगे।
सब भागकर कृष्ण के पास पहुंचे, “कान्हा, अब क्या होगा? इंद्र नाराज़ हो गए हैं!” कृष्ण मुस्कुराए और बोले, “डरो मत, गोवर्धन हमारी रक्षा करेगा।”
कृष्ण गोवर्धन पर्वत के पास गए और उसे अपनी बाएं हाथ की छोटी उंगली (कनिष्ठा) पर छाते की तरह उठा लिया! उन्होंने सबसे कहा, “सब अपनी गायों और सामान के साथ पर्वत के नीचे आ जाओ।” पूरा ब्रज — लोग, गायें, बछड़े — पर्वत के नीचे सुरक्षित हो गया।
इंद्र ने सात दिन और सात रात लगातार बारिश की, पर कृष्ण बिना थके, बिना हिले पर्वत उठाए खड़े रहे। किसी पर एक बूंद भी नहीं गिरी।
आख़िर इंद्र समझ गए कि यह बालक कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं। उनका घमंड टूट गया। उन्होंने बारिश रोक दी और कृष्ण के पास आकर क्षमा मांगी। कृष्ण ने उन्हें माफ़ कर दिया और समझाया कि शक्ति का उपयोग रक्षा के लिए होना चाहिए, डराने के लिए नहीं।
बारिश थमने पर कृष्ण ने पर्वत को धीरे से वापस उसकी जगह रख दिया। ब्रजवासियों ने ख़ुशी में ढेरों पकवान बनाकर भोग लगाया — यही अन्नकूट की परंपरा बनी। तभी से कृष्ण को गिरधारी या गोवर्धनधारी भी कहा जाता है।
📖 कथा की सीख: इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि घमंड का अंत निश्चित है और सच्ची शक्ति दूसरों की रक्षा में है। कृष्ण ने यह भी सिखाया कि हमें प्रकृति — पर्वत, जंगल, नदी और पशुओं — का सम्मान और आभार मानना चाहिए, क्योंकि वही हमारा जीवन चलाते हैं।
गोवर्धन पूजा कैसे मनाते हैं?
| परंपरा | क्या करते हैं |
|---|---|
| गोवर्धन आकृति | आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत और कृष्ण की आकृति बनाते हैं |
| पूजा और परिक्रमा | आकृति की पूजा करके उसकी परिक्रमा की जाती है |
| अन्नकूट | 56 भोग सहित कई तरह के पकवानों का भोग लगाया जाता है |
| गौ पूजा | गायों को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा की जाती है |
| गिरिराज परिक्रमा | मथुरा के पास असली गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) की परिक्रमा |
स्रोत: श्रीमद्भागवत पुराण (दशम स्कंध) में वर्णित कथा, हमारे अपने सरल शब्दों में। और पढ़ें: धनतेरस की कथा · दिवाली की कहानी · भाई दूज की कथा · पौराणिक कथाएं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गोवर्धन पूजा की कथा क्या है?
ब्रजवासी हर साल इंद्र की पूजा करते थे। कृष्ण ने उन्हें गोवर्धन पर्वत की पूजा करने को कहा, जो गायों को चारा और पानी देता था। नाराज़ इंद्र ने सात दिन तक मूसलाधार बारिश की, तो कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत छोटी उंगली पर उठाकर सबको बचाया और इंद्र का घमंड तोड़ा।
गोवर्धन पूजा कब मनाई जाती है?
गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है। यह पांच दिन के दीपोत्सव का चौथा दिन है। कुछ वर्षों में तिथि के कारण यह दिवाली के दो दिन बाद भी पड़ सकती है, इसलिए पंचांग देखें।
श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत कितने दिन उठाया था?
श्रीमद्भागवत के अनुसार श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को सात दिन और सात रात तक अपनी बाएं हाथ की छोटी उंगली पर उठाए रखा। इस दौरान पूरा ब्रज, गायें और ग्वाले पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे और इंद्र की बारिश का कोई असर नहीं हुआ।
अन्नकूट क्या है?
अन्नकूट का अर्थ है अन्न का पहाड़। गोवर्धन पूजा के दिन भगवान कृष्ण को ढेर सारे पकवानों, सब्ज़ियों और मिठाइयों का भोग लगाया जाता है, जिसे अन्नकूट कहते हैं। मंदिरों में 56 भोग लगाए जाते हैं और फिर प्रसाद सबमें बांटा जाता है।
गोवर्धन पूजा की कथा से क्या सीख मिलती है?
इस कथा से सीख मिलती है कि घमंड का अंत होता है और सच्ची शक्ति दूसरों की रक्षा में है। यह कथा प्रकृति, पर्वत, पशुओं और पर्यावरण के प्रति सम्मान और आभार का संदेश भी देती है, क्योंकि वही हमारा जीवन चलाते हैं।