संक्षेप में: सूखते तालाब से बचाने के लिए दो हंस अपने दोस्त कछुए को एक डंडी के सहारे उड़ाकर दूसरी झील ले चले। शर्त थी कि कछुआ रास्ते में मुंह नहीं खोलेगा। नीचे लोगों की बातें सुनकर बातूनी कछुआ बोल पड़ा, डंडी छूट गई और वह नीचे गिर पड़ा।
तालाब के तीन दोस्त
एक सुंदर तालाब में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ रहता था। उसी तालाब के किनारे दो हंस भी रहते थे — संकट और विकट। तीनों पक्के दोस्त थे। रोज़ शाम को वे घंटों बातें करते।
कछुए की बस एक बुरी आदत थी — वह बहुत बोलता था। किसी की भी बात हो, वह बीच में बोले बिना नहीं रह पाता था।
सूखता तालाब
एक साल बारिश नहीं हुई। तालाब का पानी दिन-ब-दिन कम होने लगा। हंसों ने कहा, “दोस्त, यह तालाब जल्दी ही सूख जाएगा। हम तो उड़कर किसी दूसरी झील पर चले जाएंगे, पर तुम्हारा क्या होगा?”
कछुआ उदास हो गया। “मैं तो उड़ नहीं सकता। मुझे भी अपने साथ ले चलो।”
डंडी वाली तरकीब
हंसों ने सोचा और एक तरकीब निकाली। वे एक मज़बूत लकड़ी की डंडी लाए। “हम दोनों डंडी के दोनों सिरे अपनी चोंच में पकड़ेंगे। तुम बीच से डंडी को अपने मुंह से कसकर पकड़ लेना। पर याद रखना — रास्ते में चाहे कुछ भी हो, मुंह मत खोलना।”
“बिल्कुल नहीं खोलूंगा,” कछुए ने वादा किया।
कछुए की भूल
हंस उड़ चले और कछुआ डंडी से लटका हुआ आसमान में जाने लगा। नीचे एक गांव आया। बच्चों ने ऊपर देखा और तालियां बजाकर चिल्लाने लगे, “देखो, देखो! हंस कछुए को उड़ा ले जा रहे हैं! कितना अजीब है!”
कछुए को यह बात बुरी लगी। उसने सोचा, “ये लोग मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं। इन्हें जवाब देना चाहिए।”
वह भूल गया कि उसने क्या वादा किया था। जैसे ही उसने बोलने के लिए मुंह खोला — “तुम लोग…” — डंडी उसके मुंह से छूट गई और वह धड़ाम से नीचे गिर पड़ा।
दोनों हंस दुखी होकर देखते रह गए। उन्होंने कहा, “काश, हमारा दोस्त थोड़ी देर चुप रह पाता।”
📖 कहानी की सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बिना सोचे-समझे और ज़रूरत से ज़्यादा बोलना नुकसान पहुंचाता है। अच्छे दोस्तों की सलाह माननी चाहिए और अपने वादे पर टिके रहना चाहिए — हर बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता।
कहानी के पात्र
| पात्र | भूमिका |
|---|---|
| कम्बुग्रीव (कछुआ) | बातूनी कछुआ, जो अपना वादा भूल गया |
| संकट और विकट (हंस) | कछुए के सच्चे दोस्त, जिन्होंने उसे बचाने की कोशिश की |
| गांव के लोग | जिनकी बातें सुनकर कछुआ बोल पड़ा |
बच्चों से पूछें
- हंसों ने कछुए को क्या शर्त बताई थी?
- कछुए ने मुंह क्यों खोला?
- कब चुप रहना बोलने से ज़्यादा समझदारी होती है?
यह कथा पंचतंत्र के पहले तंत्र “मित्रभेद” की प्रसिद्ध कहानी का हमारे अपने शब्दों में पुनर्कथन है। पंचतंत्र की मूल कथा में कछुए का अंत दुखद है; छोटे बच्चों को सुनाते समय आप इसे “कछुआ झाड़ियों में गिरा और बच गया, पर उसने सबक सीख लिया” की तरह भी सुना सकते हैं। और पढ़ें: पंचतंत्र की कहानियां
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कछुआ और हंस की कहानी की सीख क्या है?
यह कहानी सिखाती है कि बिना सोचे और ज़रूरत से ज़्यादा बोलना नुकसान पहुंचाता है। कछुए ने वादा किया था कि वह मुंह नहीं खोलेगा, पर लोगों की बातों पर जवाब देने के लिए बोल पड़ा और नीचे गिर गया। अच्छे दोस्तों की सलाह और अपना वादा दोनों निभाने चाहिए।
हंसों ने कछुए को कैसे उड़ाया?
दोनों हंसों ने एक मज़बूत डंडी के दोनों सिरे अपनी चोंच में पकड़े और कछुए ने डंडी का बीच का हिस्सा अपने मुंह से कसकर पकड़ लिया। इस तरह हंस उड़ते गए और कछुआ डंडी से लटककर उनके साथ आसमान में चलता गया।
कछुआ और हंस पंचतंत्र की किस कथा से है?
यह कहानी पंचतंत्र के पहले तंत्र “मित्रभेद” में आती है। मूल कथा में कछुए का नाम कम्बुग्रीव और हंसों के नाम संकट और विकट बताए जाते हैं। यही कथा बौद्ध जातक कथाओं में भी बातूनी कछुए की कहानी के रूप में मिलती है।
छोटे बच्चों को यह कहानी कैसे सुनाएं?
3–6 साल के बच्चों को यह कहानी सुनाते समय अंत को नरम बनाया जा सकता है, जैसे “कछुआ झाड़ियों में गिरा, बच गया और उसने सबक सीख लिया।” मुख्य बात यह समझाएं कि वादा निभाना और हर बात का जवाब न देना भी समझदारी है।